सूरज की पहली किरण ताड़ के सघन वृक्षों से विस्फुटित होकर तालाब के शीतल जल और भोर सुंदरी के छरहरे बदन को छूते हुए अपना दिन आरंभ करतीं। एक पखवाड़े से तो मैं भी इस विहंगम दृश्य का साक्षी हूं पहले आश्चर्य, उत्सुकता और अब कामना! शायद आभास उसे भी था कोई ताड़ वृक्षों की ओट में छिपा बैठा है।
सहसा एक आवाज ने मुझे जड़ कर दिया “सुनो, तुम यहां मेरे पास आ सकते हो?
इसे इजाजत समझूं या प्रश्न? मेरे शरीर से पसीने की गति जमीन की ओर तीव्र हो चली थी जानो आज तालाब छलक जाएगा। मेरे लड़खड़ाते कदम उससे कुछ कदमों की दूरी पर ठिठक गए।
उसके आधारों से निकले मधु तार मेरे हृदय तक पुनः पहुंचे “देखूं मैं तालाब किनारे प्यासा खड़ा है, जबकि पहरेदार नहीं कोई!”
अब तो मानो न्योता मिला हो किसी बच्चे को मिठाई खाने का, जो आंखें मींचकर निश्चय ही हाथ बढ़ाएगा। कोशिश नाकाम देख मैंने असमंजस भरी निगाहों से प्रश्नचिन्हित किया परिस्थिति को!
पुनः उसके अधरों से मधु धारा निकल मेरे मस्तिष्क में जोर की- “कोई वजह दो मुझे, छूने का हक दे दूं तुम्हें?”
यह सुन मेरी रक्त शिराओं ने भी अपनी दिशा गति मस्तिष्क की ओर कर दी, दिल को तो मैं शायद बीते कुछ क्षणों से भूल ही गया।
काम और योवन मोह वश जवाब स्वतः निकला -“रात से घने केश, मृगनयनी, पुष्प पंखुड़ी से अधर, लहराते कांश सी कमर, सांवरी काया का मैं भोगी बन जाऊं, दे इजाजत नहीं तेरा जोगी बन जाऊं।”
मेरी उत्कंठा तीव्र हो चली थी, तभी वह जल की गहराई में छिपने लगी थी। मुड़कर पूछा -“तुम्हें चाहत मेरी है या मेरी मोहब्बत की?
जल क्रीड़ा करते वह अप्सरा सी लग रही थी, उसकी अठखेलियों को देख आंखें मींचकर, बिजली की कौंध से तीव्र मेरे स्वरों ने उसकी चाहत मांग लिया।
पंछियों की मधुर वाणी कानों में गूंज रही थी,नजरें भोर सुंदरी खोज रही थी।
– ख़िरमन