इक शाम तेरे साथ गुजारूं,
कुछ तुम कहो, कुछ मैं सुनाऊं।
इश्क है क्या? क्या है इश्क ?
आ, बैठ मैं तुझे बताऊं।
के तरन्नुम की समझ न थी,
अब ख़िरमन-ए-शायरी कहलाऊं।

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