मेरे गांव से 3 किलोमीटर दूर एक बड़ा कस्बा है जहां शुक्रवार सप्ताहिक बाजार लगता है। न जाने कितने ही शुक्रवार को मेरी नजरें उसे देखकर खिल उठती है और वह मुझे देख कर संभल कर अपनी दुकान में बैठती है। मैंने आज तक उसकी दुकान से कुछ खरीदा नहीं लेकिन पिछले कितने ही शुक्रवार चले गए बिना कुछ कहे दिलों के लेन-देन करते। वहां से केवल दो बार ही गुजरना पूरे सप्ताह का प्रेम रस दे जाता है, उसकी नजरें मुझे दूर से ही देख कर प्रेम लाज के मारे सकुचाई सी रह जाती। उसके चेहरे की मुस्कान हफ्ते भर का सुकून दे जाती। नजरों वाला यह प्यार दोनों ही समझ गए, लेकिन मैंने परखने की कोशिश में अपने आप को ग्लानि के अवसाद से भर लिया था, जिसका एहसास मुझे तुरंत ही हो गया।
उस दिन बाजार में चुपके से नजर रखा, ताकि जान सकूं उसकी नजरों की खोज मैं हूं या मेरा वहम।
तब पहली बार मैंने उसे इतना उदास पाया और अपने आप को बहुत ही गिरा महसूस किया। वह मेरा इंतजार करती है, उसकी नजरें मुझे भीड़ में खोजती रहती है, उसका दिल मायूस रहता है, उसके चेहरे में मुस्कुराहट दस्तक नहीं देती जब तक उसे मेरे आने की आहट नहीं होती।
आज तक ना हमारी बात हुई है और ना ही हमें एक दूसरे का नाम पता है, न जाने दिल का यह खेल,आंखों की अठखेलियां, चेहरे की मुस्कुराहट कब तक रहेंगी। लेकिन यह नजरों वाला प्यार मेरा नशा, मेरा जुनून, मेरा सुकून बन गया है। डरता हूं कहीं इसमें बदलाव ना आ जाए, इसीलिए तो कभी उसे और जानने की कोशिश नहीं किया, डरता हूं कहीं उसे खो ना दूं , डरता हूं कहीं हमारा नजरों वाला प्यार बाजार में नीलाम ना हो जाए , डरता हूं कहीं हमारा दिलों का सौदा टूट ना जाए , डरता हूं कहीं चेहरे की मुस्कुराहट खो ना जाए।
आज भी शुक्रवार है, आज भी बाजार है, यह नजरों वाला प्यार आज भी बरकरार है। फिर वही इंतजार….. नजरों वाला प्यार….
लेखक
केशव डेहरिया (K_logs)

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