बुर्का v/s घुंघट

बुर्का और घूंघट को लेकर पहले से ही काफी विवाद होते आ रहे हैं। कभी राजनीतिक तो कभी संप्रदायिक मुद्दा बने हुए हैं।
केवल महिलाएं ही पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी संस्कृति और इतिहास का बोझ वहन कर रही हैं।
हर जगह यही बात होती है कि महिलाओं को पुरुषों की तरह समान अधिकार दिया जाए तो फिर क्यों बुर्का और घूंघट की बात आने पर उसे संस्कृति और इतिहास से जोड़ दिया जाता है।
शिक्षा,नौकरी, यहां तक कि राजनीतिक कार्यालयों में भी महिलाओं को समान अधिकार दिलाने के लिए कानून बना दिए गए हैं, फिर बुर्का और घूंघट में क्यों रूढ़िवाद दिखाया जाता है।
मेरे विचार से महिलाओं को स्वयं इस बात का निर्णय लेना चाहिए कि उन्हें बुर्का, घुंघट लेना है या नहीं।
और उनके इस निर्णय पर किसी संप्रदायिक प्रमुख अथवा राजनीतिक या सामाजिक व्यक्तियों को किसी भी प्रकार की परेशानी नहीं होना चाहिए।

BURQA v/s GHOONGHAT

There is already a lot of controversy over the BURQA and GHOONGHAT. Sometimes, political and remain communal harmony issues.
Only women are taking the burden of their culture and history from generation to generation.
Everywhere, women are given equal rights as men, so why is it connected with culture and history when it comes to the BURQA and GHOONGHAT?
Educational, jobs, even political offices everywhere laws have been enacted to provide equal rights to women, and then why orthodox is shown in BURQA and GHOONGHAT.
I think women themselves should decide whether they should take BURQA ,GHOONGHAT or not.
And their decision should not cause any kind of trouble to any communal chief or political or social person.