काॅलेज के अंतिम वर्ष तक सपने हमेशा चमकदार ही दिखते थे।
उन्हीं दिनों सरकारी नौकरी पाने की होड़ के डरावने लक्ष्य का कफ़न सर पर बांधे हम भी खड़े थे।
लेकिन तब भी हमारे सपनों में निजी कंपनियों और बड़े शहरों की जीवन शैली का ही बोलबाला था।
भले ही औद्योगिक बाजार का विश्लेषण कभी किया नहीं, पर किसी ने कहा कि मंदी चल रही है, वही रट लगाए सभी बेरोजगारी काटने लगे।
अपना समूह बना हम भी निकल गये कोचिंग क्लास वालों की जेब गरम करने।
घर से सब कुछ ज्यादा मिला था इस बार,,, जैसे प्यार, पैसे, हिदायत और समय सीमा।
मध्यमवर्गीय परिवार आशावादी और उम्मीदों से लबालब भरे होते हैं,अगर बेटा कोचिंग क्लास गया है तो समझो नौकरी लग ही गई।
उन्हें कुछ नया सोचने में इतना डर होता है, की वे नकारात्मक परिणामों की घोषणा पहले ही कर देते हैं।
तो जैसे किसी रिश्तेदार ने सरकारी नौकरी लगा लिया, ठीक वैसे ही उनके बेटे को भी करना होगा।
दोस्तों के बीच बातचीत में कभी सरकारी नौकरी का जिक्र नहीं होता, हां आज भी निजी कंपनियां और बड़े शहर ही गरमागरम परोसें जाते थे।
जिसने चार साल केवल तकनीकि विषयों को जाना, वे सर पीट पीट कर गैर तकनीकी विषयों को पी रहे थे।
अब तो तकनीकी विषयों को पढ़े वर्षों बीत गए और सरकारी नौकरी की परीक्षाओं के परिणाम घोषित होते लेकिन हमारा नाम नहीं होता।
परिवार में चिंता और उम्मीद दोनों ही असीमित दिखती थी, रिश्तेदार समय समय पर चिंगारी में पेट्रोल डाल जाते।
कभी कभी आग की लपटे गांव से शहर हम तक आ जाती।
बेमन ही सही तैयारी जब शिखर पर पहुंची, घर बुलावा आया कारण बेहाली बताया।
अब तो ताने गली में खेलते बच्चे भी दे जाते, दो चार बातें सुबह-शाम बिना पानी पी जाते।
अब तो सपनों में ना निजी कंपनियां थी और ना ही उम्मीद बची सरकारी नौकरी की।
तब फिर दोस्तों का ख़्याल आया, बड़े शहर जाकर निजी कंपनियों में नौकरी पाने का मन बनाया।
दो पन्नों का बायोडाटा तैयार किया,
निकल गए अपनी बिकवाली में।
आज भी औद्योगिक बाजार में मंदी का रोना पाया, कंपनियों के गेट के अंदर कोई जा नहीं पाया।
दलालों के हाथों बिकने का रिवाज है जो आया।
बिकवाली पत्र न जाने कितने दलालों को दिखाया,
बिक्री पर अभियंता का ईमेल सबको पहुंचाया।
सबका था यही कहना चार साल कहा बने थे पहुना।
अब पछतावा आता है नवसिखुआ बोल हमें बाहर बैठाया जाता है।
दलाली और महीने भर का मेहनताना हमारी बिक्री का तय हुआ।
जमाना अब बदल गया बिकने वाला लाचार हुआ।

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