मां को पता है कि बाप बेटे में जमती नहीं है फिर भी हर बार वे नई नई तरकीबें ढूंढती हैं,हमें एक-दूसरे को समझने के लिए। आज जब मैं पढ़ाई पूरी कर शहर से घर वापस आया तो सुबह सुबह ही मां ने खेत पहुंचा दिया। नींद में बड़बड़ाते , आंखें मलते हुए जब खेत पहुंचा तो देखा और देखते ही रह गया। ठंडी हवा की सरसराहट कानों को छूती हुई मनो कुछ कह रही हो, तभी पैरों में एहसास हुआ जैसे बर्फ़ की चादर पर खड़ा हूं, बिना चप्पल जूतों के ओस भरी घांस में चलना ,आह! बचपन याद आ गया जब पिताजी के साथ खेतों में घूमा करते थे।
नज़रों को यादों से बाहर निकाल जब क्षितिज ढूंढना चाहा तो दुधिया चादर ओढ़े खेत और जंगल भी धुंधले दिखाई दिए।अब सूरज की किरणें निकलकर जब फसलों पर गिरी ओस की बूंदों से टकरा रही थी मानो प्रकृति ने अनगिनत मोती धरा पर बिखरे हों।तभी गाढ़े कोहरे को चीरती हुई एक परछाईं मेरे पास आती दिखाई दी। कुछ क्षण में ही परछाई मुझे साफ दिखाई देने लगी और मेरी आंखों में जो कोहरा छाया हुआ था वह साफ हो गया। पास आते ही पिताजी बोले राधे-राधे, मैं स्तब्ध खड़ा उन्हें देखता ही रहा, बचपन के नित नियमानुसार स्वतः ही चरणस्पर्श के साथ मेरे मुख से भी राधे-राधे का संबोधन हुआ। पिताजी ने मुस्कुराते हुए शुभाशीष दिया और कहा घर जाओ बाहर बहुत ठंड है तुम्हें आदत नहीं है इसकी।

Fathers are like coconut, which are tough from outside but soft inwardly.

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