मेरा स्कूल….बात बीते जमाने की…प्रष्ठभूमि गांव कि…

सच तो यह है कि स्कूल के मजे गांव में आते है,
प्राथमिक शाला* ये कहलाते हैं।
बच्चे कांधे पर बस्ता* लटकाए चले आते हैं,
हाथ में अपनी फट्टी* ले आते हैं।
खेल कि धुन में मशगूल इतने की,
लगता है खेत से आ रहे हैं।
बारिश तो जैसे इनके लिए आती है,
नाव कागज की और नदी किनारे केकड़े पकड़ना।
शाला कि छत टपकने पर फट्टी* सिर से ओढ लेना,
शिक्षकों को गुरूजी* कहना।
मध्यान्तर मे मिठी दलिया आज भी याद है,
शाला* के प्रांगण में बागवानी करना सबको पसंद था।
सबका अपना एक पौधा जिसकी देखभाल करते,
इनकी क्यारीयां मिला कर अपवाह तंत्र बनाया करते।
15अगस्त,26जनवरी त्यौहार थे जो याद रहते,
वरना गांव में जनम दिन भी नहीं मनाते थे।
दोहरे कपड़ों से ठंड को मात देना,
नारियल तेल सर मे जम जाता लेकिन लगाके आना।
पट्टी* कलम से पांचवीं तक पहुंचना,
अंग्रेजी छठवीं कक्षा में सीखते।
गिल्ली डंडा, टिप्पू,पिट्टू खेलकर बडे़ हुए,
*”अब वक्त बदल गया शाला-स्कूल,बस्ता-बैग,
फट्टी-डेस्क, पट्टी-कापियां, और गुरूजी बन गए सरजी।”
                                                  ©केशव डेहरिया