खचाखच भरी बस मे चिल्लाहट सुन मेरी नींद टूटी।बस के फर्श पर बैठी वृद्ध महिला को चिल्लाते हुए कंडक्टर बोला “यहाँ बैठ मत बुढ़िया,तीन जन खड़े हो सकते हैं इधर..” और हाथ पकड़कर खड़ा कर दिया। 

सब्र टूटा मेरा, वृध्दा को अपनी जगह दिलाया। बगल में अधेड़ व्यक्ति ने मुह सिकोड़, फैलकर बैठक जमाया। मैंने कहा”सरक जाऔ थोड़ा उधर, बैठना है वृध्दा को इधर।” उन्होंने कहा “तू” मैंने कहा “आप” फिर वो बोले “बे” मैं बोला”भाईसाहब”। तब भी न माने गाली देकर उन्होंने दिखाया अंगुली,,,,लगाया कान के नीचे झापड़ मैंने पकड़कर उनकी अंगुली।

सन्नाटे के बाद किसी ने बजाया ताली तो किसी ने दिया गाली। मैं न खुश था, न दुखी, मैं शर्मिंदा था।

                                ©केशव डेहरिया