गांव शब्द सुनकर छोटे व खपरैल घरों की सुंदर तस्वीर हमारे मस्तिष्क में उभरती है। वास्तव में गांव बहुत सुंदर होते हैं।

क्या वास्तव में गांव बहुत सुंदर होते हैं?

हां सचमुच गांव बहुत सुंदर होते हैं।

मेरा बचपन भी गांव में बीता है आज भी बचपन के दिन याद करता हूं तो उनकी यादों में खो जाने का मन करता है लेकिन अब ना वह बचपन है और ना ही समय। गांव की सुकून भरी वादियों को छोड़ अब लोगों में शहर की तेज रफ्तार वाली जिंदगी में ही सुकून तलाशने की होड़ सी लगी हुई है। शहरों के हलचल वाले माहौल से कहीं दूर गांव में ना किसी कारखाने का प्रदूषण और ना ही वाहनों का शोर होता है,चारों तरफ शांति ही शांति और मनोरम पहाड़ियां या समतल खेत या छोटे नदी-नाले जिनकी कल-कल की ध्वनि साफ सुनाई देती है। और गांव की सुबह आप यकीन नहीं करेंगे ऐसा लगता है जैसे प्रकृति ने किसी वास्तविक नाट्यशाला में प्रदर्शन के लिए लयबद्ध तरीके से सँजोया हो। सुबह के 4:00 बजते ही मुर्गों का अलार्म की तरह बाँघना इसी के साथ प्रकृति का वास्तविक नाटक आरंभ होता है। पक्षियों की चहचहाट जैसे कोई सुरमई संगीत और सूरज की किरणों का बिखरना मानो अब मंच पर कलाकारों का आगमन होने वाला हो। तो लीजिए मंचन आरंभ हो गया है – प्राकृतिक दातुन यानी नीम की पत्नी लकड़ी से दांतों को साफ करना, गायों का दूध दुहना, महिलाओं द्वारा सिर में गाघर रखकर पानी लाना, बच्चों का गलियां आंगन में खेलना, पशुओं का जंगल जाना आदि बहुत ही मनोरम होता है। वैसे बच्चों के खेल भी निराले होते हैं और यह खेल क्षेत्रवार अलग-अलग तरह के होते हैं, इनमें से कुछ जो मुझे याद है- कंचे,गिल्ली-डंडा,पिट्टू , टिप्पू , पत्थर चट्टी, चुनी,ठिब्बो आदि। इनके नाम अजीब लगते हैं लेकिन खेलने में काफी मजेदार होते हैं। आजकल इनमें से कई खेला के Android एप्स बन चुके हैं जिन्हें अब बच्चे मोबाइल में खेलते हैं। लेकिन मोबाइल में वह मजा कहां जो गांव की गलियों में खेलने में है। घरों के किनारे से ही लगी खेतों की हरियाली देखते ही बनती है। अब तो हर गांव में स्कूल खुल गए हैं कुछ वर्ष पहले बच्चे कोसों दूर पैदल स्कूल जाया करते थे। समय के साथ अब गांवों में भी तकनीकों का उपयोग होने लगा है। कस्बों शहरों और देश दुनिया से जुड़ने के लगभग सभी साधन अब गांवों में उपलब्ध है लेकिन अभी भी भी बहुत से ऐसे गांव है जो अति पिछड़े क्षेत्र में गिने जाते हैं। वहां ना आवागमन की सुविधा है, ना ही अस्पताल और ना ही दूरसंचार की सुविधा है। वे लोग प्रकृति के करीब हैं लेकिन हमारी दुनिया से बहुत दूर हैं,उन्हें सहायता की आवश्यकता है हमारी हम सभी की जिससे वे जुड़ सकें इस दुनिया से और हम उनसे।

आप भी आवकाश मिलने पर गांव जाकर मनोरम वादियों का लुफ्त उठाएं और जरुरतमंदों की सहायता करें।

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